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अति के छोर पर अंत है

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अंत में कुछ नहीं रह जाएगा न हाथों  का हीना न सीने का इतर न पशमीनों का ताप न सूत की ठंडक   न ब्याह के ताशे न महफ़िलों के पैगाम न किताबों की पीठ भरी जाएगी न कटने के लिए इंसानों की बोली लगाई जाएगी   न हिज्र की आह होगी न वस्ल का लाल न प्रसव की पीड़ न जन्म का हर्ष   न कच्छ का रण होगा न कश्मीर की वादियाँ न जॉर्डन के मंदिर न गल्फ़ की इमारतें न कुंडो का पानी न हवनों की आग न अगुओं के बुत न शामनों की राख़   न पैसों की हड़क न देह की प्रभुसत्ता न बलात्कारियों के नाखून न दलितो की जाँघें न कोरे शहर होंगे न इनके काले नालें न गुलाम न तानाशाह दरवाजें टूट चुके होंगे छतें तबाह   इक दिन ऐसा भी आएगा कि दिलों का अंधेरा भरें आसमान में छाएगा रक्त का उबाल नदियों में होगा ज़हन की आग जमीन से रिसेगी अति होगी अति होगी और अति की भी अति होगी और अति के छोर पर फिर अंत आयेगा   अंत में होगी कराह भी करुणा भी  चीखें भी होंगी कई चाह भी मति को कोसा जाएगा आँखों को नोचा जाएगा अनघड़ बच्चे सिद्ध ...

नर्निया

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एक ख़्वाब है नार्निया जो अधीन है बिरूठे हुए पिताओं सिकुड़ती हुई माँओं बिन छत और परिवार की संतानों की पीड़ का उन परिवारनुमा बच्चों की टीन्स का जिनका परिवार है पर वस्तुतः नहीं है  नार्निया का ख्वाब अधीन है एक टूटी हुई दुनिया का   वो याद है नर्निया  जो रह-रह कर याद आती है जबकि एटेरनल सनशाईन की क्लेमेंटीन सरीखा खिज़ में भर बेदर्दी से मिटा दिया है हमने इसे बाकयदा घूमते फिरते साँझ-सहर फिर कहीं इसी से दोबारा टकरा जाने के लिए नर्निया हमारे ज़हन से अनप्रोग्राम न होने वाली सबसे ज़िद्दी-हट्ठी याद है   नार्निया की चाहत सबसे इनएवीटेबल चाहत है  ‘ मैं कौन’ और ‘मैं क्यों’ के न मिलते जवाबों का अदृश सूत्र है कर्मकांडी के लिए उसके बाप की जागीर है स्वधर्मी के लिए मात्र एक शब्द जो उसके मन में मिचलन और सिर में दर्द पैदा करता है  नास्तिक के लिए उसके नास्तिक होने का मुख्य कारण और जमीन पर लोटे खाते बच्चो के लिए एक खिला आसमान असीम , स्वाभाविक , सुंदर   नार्निया पर चिंतन मानवजाति का सबसे मौलिक चिंतन है दुखद है हमारा चिंतन कभी हमे नार्निय...