अति के छोर पर अंत है
अंत में कुछ नहीं रह जाएगा न हाथों का हीना न सीने का इतर न पशमीनों का ताप न सूत की ठंडक न ब्याह के ताशे न महफ़िलों के पैगाम न किताबों की पीठ भरी जाएगी न कटने के लिए इंसानों की बोली लगाई जाएगी न हिज्र की आह होगी न वस्ल का लाल न प्रसव की पीड़ न जन्म का हर्ष न कच्छ का रण होगा न कश्मीर की वादियाँ न जॉर्डन के मंदिर न गल्फ़ की इमारतें न कुंडो का पानी न हवनों की आग न अगुओं के बुत न शामनों की राख़ न पैसों की हड़क न देह की प्रभुसत्ता न बलात्कारियों के नाखून न दलितो की जाँघें न कोरे शहर होंगे न इनके काले नालें न गुलाम न तानाशाह दरवाजें टूट चुके होंगे छतें तबाह इक दिन ऐसा भी आएगा कि दिलों का अंधेरा भरें आसमान में छाएगा रक्त का उबाल नदियों में होगा ज़हन की आग जमीन से रिसेगी अति होगी अति होगी और अति की भी अति होगी और अति के छोर पर फिर अंत आयेगा अंत में होगी कराह भी करुणा भी चीखें भी होंगी कई चाह भी मति को कोसा जाएगा आँखों को नोचा जाएगा अनघड़ बच्चे सिद्ध ...